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तवज्जो या पहचान के मोहताज न होने पर भी वोटों से वंचित,ओवैसी, |

लखनऊ : ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (एआईएमआईएम) ने बीते कुछ सालों में तेजी से अपनी पार्टी को मजबूत किया है ,दशकों से तेलंगाना में पुराने हैदराबाद के आसपास की सीटों पर प्रभाव रखने वाला ये दल 2014 के बाद कई राज्यों में अच्छी पकड़ बना चुका है।

खासतौर से महाराष्ट्र और बिहार में पार्टी ने काफी बढ़िया प्रदर्शन किया है। एआईएमआईएम अध्यक्ष असदुद्दीन ओवैसी पार्टी के लिए काफी मेहनत भी करते दिखते हैं। इन दिनों वो यूपी में सक्रिय हैं लेकिन क्या यूपी में उनको बिहार जैसी सफलता मिल सकेगी।

उत्तर प्रदेश में अगले साल मार्च-अप्रैल में चुनाव हो सकता है। चुनाव को लेकर राज्य में सबसे पहले सक्रिय होने वाले नेताओं में असदुद्दीन ओवैसी का भी नाम है। ओवैसी ने ओम प्रकाश राजभर के राष्ट्रीय भागीदारी संकल्प मोर्चा का ऐलान काफी पहले कर दिया था। इसके बाद जुलाई में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने ओवैसी को देश का बड़ा नेता कहकर उनको एक तरह से यूपी में स्थापित करने की कोशिश भी की। हालांकि राजभर ने ओवैसी से नाता तोड़ अब समाजवादी पार्टी से गठबंधन कर लिया है। इसके बावजूद ओवैसी लगातार जनसभाएं कर रहे हैं। करीब 100 सीटों पर ओवैसी उम्मीदवार उतारना चाहते हैं।

असदुद्दीन ने हाल ही में मुजफ्फरनगर, मुरादाबाद, मेरठ, अलीगढ़ में रैलिया की हैं। बाराबंकी, इलाहाबाद,आजमगढ़, अयोध्या, भदोही में भी वो भजनसभाएं कर चुके हैं। असदुद्दीन ओवैसी अच्छी मुस्लिम जनसंख्या वाले जिलों और इलाकों में ही सभाएं कर रहे हैं और लगातार सपा, कांग्रेस जैसे दलों को निशाने पर ले रहे हैं। असदुद्दीन ओवैसी मुस्लिमों से गैरजाहिरा और जाहिरा तौर पर सपा-कांग्रेस जैसे दलों की बजाय अपनी ओर आने को कह रहे हैं। ओवैसी अच्छे वक्ता हैं और उनकी सभाओं में भीड़ भी जुट रही है। वो अपनी बातों को जिस अंदाज में कहते हैं, उनका मैसेज भी आसानी से पहुंचता है। ऐसे में ये देखने में आ रहा है कि मुस्लिमों के बीच उनकी लोकप्रियता बढ़ी है। छह-सात साल पहले भले यूपी में उनको पहचानने वाले कुछ ही लोग हों लेकिन आज उनका चेहरा एक पहचान बना चुका है।

असदुद्दीन ओवैसी की सभाओं की भीड़ हो या सोशल मीडिया पर उनको लेकर लोगों की राय, इससे एक बात तो तय है कि मुस्लिमों के एक वर्ग के बीच उन्होंने खुद को पहुंचाने में कामयाबी हासिल की है। सोशल मीडिया पर कई युवा उनके पक्ष में तर्क देते दिखते हैं लेकिन जमीन पर उनके पक्ष में वोटर शायद अभी बहुत कम हैं। हम यूपी के हालिया सर्वे भी देखें तो उसमें ओवैसी कोई प्रभाव छोड़ते नहीं दिख रहे हैं।

असदुद्दीन ओवैसी अगर लोगों तक बात पहुंचाने में कामयाब हो रहे हैं, मीडिया में उनको खूब तवज्जो मिल रही है तो फिर उनको वोट क्यों नहीं मिलते दिख रहे हैं। इसको लेकर राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि असदुद्दीन ओवैसी जिस वजह से लोकप्रिय हुए हैं, वही वजह उनको वोट ना मिलने का भी है। ओवैसी की लोकप्रियता 2014 के बाद यानी हिन्दुओं को लेकर राजनीति में एक नई बहस आने के बाद बढ़ी है। जिसका फायदा उन्होंने मुस्लिम राजनीति की बात कर उठाया है। उत्तर प्रदेश में खासतौर से कुछ चुनावों से मुस्लिमों के बीच एकजुट वोट करने का चलन दिखा है। इसमें भाजपा के मुख्य मुकाबले वाली पार्टी को वो तरजीह देते हैं। यूपी में क्योंकि सपा और बसपा ही ज्यादातर सीटों पर बीजेपी के साथ मुकाबले में हैं। ऐसे में मुस्लिमों को लगता है कि किसी और को वोट करना तो ‘वोट बेकार’ करने जैसा है। ऐसे में एक बड़ा वर्ग भले ही ओवैसी की सभा में जाए लेकिन वोट करते हुए उसकी प्राथमिकता बदल जाती है।

2017 में यूपी विधानसभा के चुनाव में ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम ने 38 सीटों पर कैंडिडेट उतारे थे। इनमें सभी ऐसी सीटें थीं, जिन पर मुसलमान मतदाताओं की संख्या निर्णायक है। 38 में से 37 सीटों पर एआईएमआईएम के उम्मीदवारों की जमानत जब्त हो गई थी। सभी सीटों पर पार्टी को करीब 2 लाख वोट ही मिले। ये एआईएमआईएम के लिए निराश करने वाले नतीजे थे लेकिन 2020 में बिहार विधानसभा चुनाव में पांच सीटों पर जीत के बाद एआईएमआईएम का हौसला बढ़ा हुआ है।

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