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भारतीय विदेश नीति में आए बदलाव का असर देखने को मिला अच्छे और बुरे वक्त में

नई दिल्‍ली। भारत किसी देश से न आंख झुकाकर बात करेगा, न आंख उठाकर बात करेगा, अब वह आंख में आंख डालकर बात करेगा। 2014 से भारतीय विदेश नीति के तेवर में आया ये आक्रामक बदलाव उसकी समदर्शी विदेश नीति को दिखाता है। गरीब, अमीर, विकसित और विकासशील देशों में कोई भेद न करने के उसके आत्मविश्वास की ये बानगी पेश करता है। प्रधानमंत्री मोदी की ताबड़तोड़ विदेश यात्राओं ने उन्हें दुनिया के लोकप्रिय शासनाध्यक्षों की अग्रिम पंक्ति में खड़ा कर दिया। जिस देश में दशकों से कोई भारतीय प्रधानमंत्री नहीं गया था, उन्होंने वहां भी पहुंचकर उसकी कुशल क्षेम पूछी। कहते हैं कि अच्छे समय में किया गया निवेश बुरे वक्त में काम आता है।

भारत के सामने जब भी बुरा वक्त आया तो उसके परंपरागत मित्र देश तो साथ खड़े ही हुए, अप्रत्याशित रूप से अपरिचित रहे मुल्क भी मददगार बने। कोरोना महामारी इसकी महज एक नजीर ही है जब दुनिया के तमाम देशों ने मेडिकल संसाधनों से भारत को मदद पहुंचाई। यह नई विदेश नीति और कूटनीति का ही इकबाल और प्रताप है कि खाड़ी देशों से उसके संबंध इतने मजबूत हो चुके हैं जिसकी बानगी ओआइसी के सम्मेलन में देखने को मिली, जब इस संगठन के परंपरागत सदस्य पाकिस्तान के विरोध के बावजूद भारत का आमंत्रण रद नहीं किया गया। उसकी यही कमाई अफगानिस्तान समस्या के समय उसके काम आ रही है।

अमेरिकी सैनिकों की वापसी के बाद तालिबान के शासन में आने से मची अफरा-तफरी में हर भारतीय को सुरक्षित ठिकाने तक वह इसी वजह से पहुंचा पा रहा है। अफगानिस्तान से भारत के प्राचीन सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक संबंध रहे हैं। मधुर संबंधों की थाती को हम आज तक सहेजते रहे हैं तभी तो बिखर चुके अफगानिस्तान के पुननिर्माण के लिए भारत ने तिजोरी खोली। इसके सृजनात्मक कदमों की तालिबान ने भी प्रशंसा की है। हालांकि अब तस्वीर बदल चुकी है। भारत विरोधी गतिविधियों में तालिबान के इस्तेमाल का पाकिस्तान खम ठोंक रहा है।

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