सनातन संस्कृति एवं स्वभाषा के दायित्व बोध के प्रति सजग थे अटल

अर्ली न्यूज़ नेटवर्क।

जय प्रकाश पांडेय।
भारत की आजादी ब्रिटिश हुकूमत के दमन,अत्याचार एवं औपनिवेशिक लूट के खिलाफ असंख्य बलिदानों,संघर्षों की देन है।स्वतंत्रता की प्रभात बेला में भारत वासियों के हृदय में स्वदेश, स्वधर्म, स्वभाषा एवं सनातन संस्कृति के गौरव की पुनर्प्रतिष्ठा का ज्वार हिलोरें ले रहा था। स्वाभाविक रूप से सदियों की विदेशी गुलामी के कारण हम अपने अतीत से,अपनी जड़ों से इस कदर कट चुके थे कि खुद का वजूद खो रहे थे। लेकिन दुर्भाग्य से यूरोप केंद्रित आधुनिकता के प्रबल पक्षधर जवाहर लाल नेहरू ने भारतीय संस्थाओं, लोक परंपराओं, इतिहास,सनातन संस्कृति एवं भारतीय भाषाओं की रचनात्मक क्षमता को खारिज कर दिया। राष्ट्र निर्माण के लिए नेहरू के यहां पश्चिम का प्रभाव महज प्रेरणा के स्तर पर नहीं था, बल्कि वह एक बोझ की तरह संस्थागत रुप में भारत राष्ट्र और समाज पर लादा जाने लगा। भारत से भारतीयता मिटाए जाने के ऐसे दौर में ही अटल बिहारी वाजपेई का राजनीतिक रंगमंच पर अवतरण होता है। स्वदेश, स्वधर्म, सनातन संस्कृति एवं स्वभाषा के दायित्व बोध के प्रति सजग अटल अपने जाग्रत विवेक एवं नैतिक बल के बूते समूची व्यवस्था से मुठभेड़ मोल लेते हैं। विविधता के इस देश में अटल समन्वय की विराट प्रतिभा लेकर प्रकट हुए। उनका व्यक्तित्व देश के पृथक-पृथक जीवन मूल्यों, विचारों एवं आदर्शों के संश्लेषण से निर्मित था। उनमें धर्मराज युधिष्ठिर सरीखे सत्य का अटल आग्रह था तो कर्ण की तरह मित्रता के लिए सर्वस्व बलिदान का नैतिक उत्साह भी था। उनमें एक ओर कौटिल्य का राजनयिक चातुर्य एवं राष्ट्रीय प्रतिरक्षा के लिए स्कंदगुप्त की अपराजेय जीवटता थी तो दूसरी ओर कालिदास का भावप्रवण हृदय भी था। उनकी जीवन की साधना एवं आस्था का केंद्र भारत था। अटल के लिए धरती भारत भूमि परअपनी धुरी पर नृत्य करती हुई प्रतीत होती है। लय की वही गति भारतीय आकाश के मेघों में, वन की हवाओं में, पक्षियों के कलरव में,नदियों झरनों के कल-कल में भी उन्हें भारत का गौरव गान सुनाई पड़ता था।
अटल की भारत आस्था की अप्रतिम अभिव्यक्ति ‘राष्ट्र पुरुष’ की विलक्षण संकल्पना में प्रदर्शित होती है-‘भारत जमीन का टुकड़ा नहीं, जीता जागता राष्ट्र पुरुष है, हिमालय मस्तक है, कश्मीर किरीट है,पंजाब और बंगाल दो विशाल कंधे हैं, पूर्वी और पश्चिमी घाट दो विशाल जंघाए है, कन्याकुमारी इसके चरण है, सागर इसके पग पखारता है, यह चंदन की भूमि है, अभिनंदन की भूमि है,यह तर्पण की भूमि है, यह अर्पण की भूमि है, इसका कंकर- कंकर शंकर है, इसका बिंदु- बिंदु गंगा जल है, हम जिएंगे तो इसके लिए मरेंगे तो इसके लिए।’राष्ट्रहित के सवाल पर पांडवों की तरह अटल कहते हैं कि हम एक सौ पांच हैं-‘वयम् पंचाधिक शतम्’।तुलसीदास ने भगवान राम के बारे में लिखा है- ‘बैरियु राम बड़ाई करहीं’।बहुत हद तक यह कथन अटल के लिए भी सत्य सिद्ध होता है। नेहरू से लेकर नरसिम्हा राव तक का कांग्रेसी नेतृत्व, चंद्रशेखर, मुलायम सिंह यादव, जयललिता, ममता बनर्जी, सोमनाथ चटर्जी सहित समूचा समकालीन नेतृत्व वैचारिक विरोधी होते हुए भी अटल की प्रतिभा का कायल था।1957 में बलरामपुर लोकसभा क्षेत्र से में पहली बार सदन में पहुंचे अटल से प्रभावित होकर नेहरू ने अमेरिकी राष्ट्रपति निर्वाचन प्रणाली को समझने के लिए उन्हें अमेरिका भेजा तो नरसिंह राव ने संयुक्त राष्ट्र संघ में भारत का पक्ष रखने के लिए अटल पर भरोसा जताया।
प्रधानमंत्री के रूप में अटल ने तेइस दलों के गठबंधन का सफल नेतृत्व करके देश को राजनीतिक अस्थिरता से बचाया। पोखरण द्वितीय का साहसिक निर्णय एवं कारगिल विजय अभियान से उन्होंने अपनी सामरिक दक्षता प्रदर्शित की।आगरा शिखरवर्ता उनके राजनयिक दूरदर्शिता का साक्ष्य है। उन्होंने कारगिल शहीदों की पत्नियों एवं माताओं को पेट्रोल पंप एवं गैस एजेंसिंयों के आवंटन का निर्णय लिया। दमन, दीव दादरा नगर हवेली के मुक्ति संग्राम के समस्त सहभागियों को स्वतंत्रता संग्राम सेनानी का दर्जा दिया।बुनियादी संरचना के स्तर पर भारत को एकीकृत करने वाले स्वर्णिम चतुर्भुज महामार्गों का जाल बिछाया। नदियों को जोड़कर एकीकृत जल मार्ग एवं जल प्रणाली रूप रेखा भी तैयार की।सुदूर गांवों की बुनियादी संरचना के विकास एवं उनको देश की मुख्य धारा से जोड़ने के लिए लक्ष्य अंत्योदय से प्रेरित अटल ने ‘प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना’ शुरू की।सुपर कंप्यूटर के निर्माण, क्रायोजेनिक इंजन प्रौद्योगिकी के विकास एवं आईटी क्रांति के तीव्र विकास में आतुरता प्रदर्शित की। भारत की पंथनिरपेक्षता एवं मुस्लिम तुष्टिकरण पर उनका मानना था,कि हम मुसलमान की पूजा पद्धति में कोई बदलाव नहीं चाहते, मक्का उनके लिए पवित्र स्थल रहेगा। लेकिन जब भारत की बात आएगी तो फिर भारत से बढ़कर कुछ नहीं होना चाहिए। मुसलमान को इसी भूमि के लिए जीना और मरना होगा। वह कहते थे कि हम मुसलमान का न तो तिरस्कार चाहते हैं, न उन्हें पुरस्कार देने के पक्षधर हैं, हम उनका परिष्कार चाहते हैं जिससे वह देश की मुख्य धारा में शामिल हो सके।
अटल नेता के साथ प्रणेता भी थे। राष्ट्र धर्म, पांचजन्य, वीर अर्जुन, स्वदेश जैसे प्रतिष्ठित पत्र,पत्रिकाओं के संपादन में अटल के लेखनकर्म की शक्ति प्रदर्शित होती है। इस स्तर पर अटल ने मार्क्स, मैकाले के मानस पुत्रों एवं इस्लाम का कसीदा पढ़ने वाली लश्कर द्वारा सनातन संस्कृति पर सुनियोजित हमलों का तार्किक प्रतिरोध किया। लेखन कर्म के साथ-साथ काव्य पाठ अटल के व्यक्तित्व की अन्यतम विशेषता थी। अपनी कविताओं के माध्यम से उन्होंने देश राग का गायन किया। 1942 में छात्र जीवन में ही अटल ने ‘मेरा परिचय’ नामक कविता में उद्घोष किया- ‘हिंदू तन- मन हिंदू जीवन रग- रग हिंदू मेरा परिचय’ इन पंक्तियों की सर्वप्रियता आज भी कायम है।संसद से सड़क तक, एकेडमिक गोष्टी से चौपाल तक लगभग आधी सदी तक भारत के सर्वोच्च वक्ता अटल सनातन संस्कृति एवं देशराग के अटल उद्गगाता का तारीखी किरदार निभाया ।लगभग पांच दशक तक राजनीति की शीर्ष पंक्ति में स्थापित रहे। किंतु इस ऊंचाई के बावजूद वह कबीर सरीखे शुचिता की चादर को बेदाग रखने में सफल हुए।अटल प्रत्येक भारतवासी को अपने जीवन का एक अंश अर्पित कर दिया है,जो हमारे हृदय में बसता है। यह हम पर निर्भर करता है कि हम उसे कितना प्रस्फुटित कर पाते हैं।







