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जलवायु परिवर्तन पर वैश्विक स्तर पर तमाम देशों के निशाने पर भारत और चीन ।

नई दिल्ली,: जलवायु परिवर्तन को लेकर भारत और चीन एक पक्ष में खड़े हैं, दुनिया के सामने भारत की छवि को धूमिल करने की कोशिश की गई है, जलवायु परिवर्तन पर वैश्विक बैठक खत्म हो चुकी है, लेकिन एक बार फिर से भारत को ‘मुजरिम’ ठहराने की कोशिश की जा रही है। हालांकि, ऐसा भी कम ही होता है, जब किसी वैश्विक मामले पर भारत और चीन एक पक्ष में खड़े हों और दोनों एक दूसरे का साथ दे रहे हों।लेकिन, आगरा के रहने वाले आलोक शर्मा बार बार भारत को अंतर्राष्ट्रीय मंच पर बदनाम कर रहे हैं। आईये जानते हैं, कौन हैं आलोक शर्मा और वो भारत को बार बार मुजरिम क्यों ठहरा रहे हैं?
जलवायु परिवर्तन पर वैश्विक सम्मेलन खत्म हो चुका है, लेकिन उस दौरान तमाम देशों के निशाने पर भारत और चीन थे और रोम में हुए सम्मेलन के दौरान इस तरह का माहौल बनाया गया था, मानो भारत और चीन ही विश्व में प्रदूषण के लिए जिम्मेदार हों। अमेरिका और पश्चिमी देश, जो सालों पहले औद्योगिक क्रांति की वजह से खुद को विकसित कर चुके हैं, वो इस वक्त भारत के विकास के पहिए में ब्रेक लगाना चाहते हैं, लिहाजा आलोक शर्मा ने भारत और चीन की जमकर आलोचना की है और एक तरह से कहें तो भारत को अंतर्राष्ट्रीय मंच पर बदनाम करने की कोशिश की है।
सीओपी-26 के प्रेसिडेंट आलोक शर्मा ने ग्लासको सम्मेलन के बाद भारत और चीन को आड़े हाथों लिया है। कॉप-26 के अध्यक्ष आलोक शर्मा ने चेतावनी देते हुए कहा कि ग्लासगो जलवायु समझौते को कम करने के बाद भारत और चीन जैसे “गरीब देशों को खुद को समझाना होगा”। आलोक शर्मा ने भारत पर निशाना साधते हुए कहा कि, भारत के कामों ने उन्हें “गहराई से निराश” कर दिया है। ब्रिटिश अखबार गार्जियन से बात करते हुए उन्होंने कहा कि, “हमारी कोशिश है कि, कोयले के इस्तेमाल को हम इतिहास बना दें और यह एक समझौता है जिसका हम निर्माण कर सकते हैं। लेकिन चीन और भारत के मामले में, उन्हें जलवायु-संवेदनशील देशों को यह बताना होगा कि उन्होंने जो किया वह क्यों किया।”
ग्लासको जलवायु परिवर्तन सम्मेलन के दौरान हालांकि, भारत कोयले के धीरे धीरे इस्तेमाल खत्म करने की बात को दुनिया के मंच पर रखने और दुनिया की मंजूरी लेने में कामयाब रहा, लेकिन अंतर्राष्ट्रीय मंच पर भारत को ही गुनहगार ठहरा दिया गया, जबकि चीन और अमेरिका जैसे देश भी यही चाहते थे। दरअसल, जलवायु परिवर्तन सम्मेलन में ‘फेज आउट’ टर्म का इस्तेमाल किया गया, जिसका मतलब ये हुआ कि, कोयले का इस्तेमाल पूरी तरह से बंद नहीं करके उसका इस्तेमाल धीरे-धीरे कम किया जाए। चीन और अमेरिका भी यही चाहते थे, कि कोयले के इस्तेमाल को लेकर सख्ती नहीं बरती जाए, लेकिन इन देशों ने भारत के कंधे पर बंदूक रखकर फायरिंग की।
जलवायु परिवर्तन सम्मेलन के दौरान जहां चीन और अमेरिका जैसे देशों ने ‘फेज आउट’ टर्म का इस्तेमाल किया था, वहीं भारत के पर्यावरण मंत्री भूपेन्द्र यादव ने ‘फेज डाउन’ शब्द का इस्तेमाल किया और सबसे दिलचस्प बात ये थी, कि ‘फेज आउट’ और ‘फेज डाउन’ पर क्या फैसला हो, इसका फैसला भारत को करना था और जब भारत ने ‘फेज डाउन’ शब्द का इस्तेमाल किया, तो सम्मेलन में शामिल सभी 200 देशों ने भारत का समर्थन कर दिया। लिहाजा सम्मेलन में ‘फेज डाउन’ टर्म को स्वीकार कर लिया गया और भारत ने जो संशोधित प्रस्ताव दिया था, उसपर मुहर लग गई। जिसके लिए सीओपी-26 के अध्यक्ष आलोक शर्मा ने माफी मांगी है। आपको बता दें कि, भारत ने आखिरी वक्त पर संशोधन प्रस्ताव दिया था, जिसका करीब 200 देशों ने समर्थन कर दिया। जिसको लेकर आलोक शर्मा ने कहा कि, ”जिस तरह से सब कुछ हुआ है, उसके लिए मैं सभी देशों से माफी मांगता हूं और मैं आपकी गहरी निराशा को समझ सकता हूं”।

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