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UN की रिपोर्ट में रेड फोर्ट कार ब्लास्ट में आया जैश-ए-मोहम्मद का नाम

अर्ली न्यूज़ नेटवर्क।

नई दिल्ली। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की ताजा रिपोर्ट ने एक बार फिर उस सच्चाई पर मुहर लगा दी है जिसे भारत लंबे समय से दुनिया के सामने रखता आया है। रिपोर्ट में जैश-ए-मोहम्मद को कई आतंकी हमलों से जोड़ा गया है और इसमें पिछले साल नवंबर में दिल्ली के लाल किला के पास हुए कार बम धमाके का भी जिक्र है। इस धमाके में 15 लोगों की जान गई थी और कई लोग घायल हुए थे। सुरक्षा परिषद की प्रतिबंध निगरानी टीम की छमाही रिपोर्ट में कहा गया कि एक सदस्य देश के अनुसार जैश-ए-मोहम्मद ने कई हमलों की जिम्मेदारी ली और उसे लाल किला हमले से भी जोड़ा गया।

रिपोर्ट के अनुसार संगठन के सरगना मसूद अजहर ने अक्टूबर में महिलाओं के लिए एक अलग विंग बनाने की घोषणा की जिसका मकसद आतंकी हमलों को सहारा देना था। इस महिला इकाई को जमात उल मुमिनात नाम दिया गया। रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि पहलगाम हमले से जुड़े तीन संदिग्ध जुलाई में मारे गए थे। इन सब सूचनाओं को जोड़ कर देखें तो एक ही तस्वीर उभरती है कि आतंकी ढांचे अभी भी जिंदा हैं, सक्रिय हैं और नए तरीके अपना रहे हैं।

देखा जाये तो लाल किला के पास 10 नवंबर को हुआ कार धमाका देश की सुरक्षा को सीधी चुनौती थी। जांच एजेंसियों को एक ऐसे सफेदपोश आतंकी नेटवर्क के सुराग मिले थे जिनके तार सीमा पार तक जाते दिखे। धमाके से पहले भी कई राज्यों में गिरफ्तारियां हो चुकी थीं और एक अंतरराज्यीय मॉड्यूल का पता चल रहा था। धमाके के बाद जांच और गहरी हुई तो पुराने सुराग और नए खुलासे एक दूसरे से जुड़ते गए। हम आपको बता दें कि 1267 प्रतिबंध समिति अल कायदा, इस्लामिक स्टेट और उनसे जुड़े संगठनों पर नजर रखती है और जैश-ए-मोहम्मद भी उसी दायरे में आता है।

देखा जाये तो यह रिपोर्ट दुनिया के लिए चेतावनी है। यह चेतावनी है कि आतंकवाद का जहर अभी भी जिंदा है और उसे खाद पानी देने वाले ढांचे भी जिंदा हैं। दुनिया को अब पाकिस्तान के असली चेहरे को पहचानना होगा। भारत बरसों से कहता रहा है कि दुनिया भर में फैल रहे आतंकवाद को सहारा पाकिस्तान की जमीन और तंत्र से मिलता है। हर बार जब कहीं कोई बड़ा हमला होता है, जांच की परतें खुलती हैं तो किसी ना किसी कड़ी का सिरा पाकिस्तान की तरफ जाता दिखता है। अब जब संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट भी ऐसे संगठनों और हमलों के रिश्ते उजागर कर रही है तो यह भारत की बात को मजबूत करती है।

सवाल यह है कि आखिर कब तक दुनिया आंख मूंद कर बैठी रहेगी? क्या आतंक के खिलाफ यही वैश्विक नीति है? सच यह भी है कि आतंक के खिलाफ लड़ाई का बड़ा हिस्सा दिखावे में उलझा है। कुछ देश मंच से सख्त बात करते हैं, मगर परदे के पीछे नरमी दिखाते हैं। यही दोहरापन आतंकी संगठनों को सांस देता है। अगर सच में आतंक को खत्म करना है तो उसके धन के रास्ते बंद करने होंगे, उसके प्रचार तंत्र पर वार करना होगा, उसकी भर्ती मशीनरी तोड़नी होगी और सबसे बढ़कर उसके पालकों को बेनकाब करना होगा। जब तक पालक बचते रहेंगे, पौधे फिर उगते रहेंगे।

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