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US सैंक्शंस Donald Trump की सनक, रूसी और ईरानी कच्चे तेल पर दी गई छूट खत्म

अर्ली न्यूज़ नेटवर्क।अंतर्राष्ट्रीय।

दिल्ली। डोनाल्ड ट्रंप के नेतृत्व में अमेरिका द्वारा रूसी और ईरानी कच्चे तेल पर दी गई छूट को खत्म करने का फैसला भारत के लिए एक बड़ी कूटनीतिक और आर्थिक चुनौती बनकर उभरा है। इसे विशेषज्ञों द्वारा भारत पर दबाव बनाने की एक सोची-समझी रणनीति के रूप में देखा जा रहा है, जिससे वैश्विक ऊर्जा बाजार में ‘पैनिक’ जैसी स्थिति पैदा हो सकती है। भारत अपनी तेल जरूरतों का एक बड़ा हिस्सा इन देशों से सस्ते दामों पर पूरा कर रहा था, लेकिन अब इस ‘अल्पकालिक राहत’ के खत्म होने से भारतीय रिफाइनरियों के सामने संकट खड़ा हो गया है। अमेरिका का यह कड़ा रुख न केवल भारत की रणनीतिक स्वायत्तता की परीक्षा लेगा, बल्कि घरेलू बाजार में ईंधन की कीमतों और मुद्रास्फीति को नियंत्रित रखने की सरकार की कोशिशों को भी मुश्किल बना सकता है। कुल मिलाकर, अमेरिका का यह कदम भारत के लिए एक ‘नयी मुसीबत’ की तरह है, जो उसे एक कठिन वैश्विक व्यापारिक चौराहे पर खड़ा करता है।

इस बात की घोषणा ट्रेजरी सेक्रेटरी स्कॉट बेसेंट ने व्हाइट हाउस में की। बेसेंट ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा, “हम रूसी तेल के लिए जारी सामान्य लाइसेंस को आगे नहीं बढ़ाएंगे, और न ही हम ईरानी तेल के लिए जारी सामान्य लाइसेंस को आगे बढ़ाएंगे। यह वह तेल था जो 11 मार्च से पहले ही पानी में (जहाजों में) था। इसलिए, वह सारा तेल अब तक इस्तेमाल हो चुका है।”

12 मार्च को, US ट्रेजरी ने 30 दिन की एक अस्थायी छूट की घोषणा की थी, जिससे भारतीय रिफाइनरियों को वह रूसी ऊर्जा खरीदने की अनुमति मिल गई थी जो पहले से ही टैंकरों में लोड हो चुकी थी।

इस छूट की घोषणा करते हुए एक बयान में बेसेंट ने कहा, “वैश्विक बाज़ार में तेल की आपूर्ति जारी रखने के लिए, ट्रेजरी विभाग 30 दिन की एक अस्थायी छूट जारी कर रहा है, जिससे भारतीय रिफाइनरियों को रूसी तेल खरीदने की अनुमति मिल सके। यह जान-बूझकर उठाया गया एक अल्पकालिक कदम है, जिससे रूसी सरकार को कोई खास वित्तीय लाभ नहीं होगा, क्योंकि यह केवल उन सौदों को ही मंज़ूरी देता है जिनमें वह तेल शामिल है जो पहले से ही समुद्र में फंसा हुआ था।”

वॉशिंगटन ने इस छूट का बचाव करते हुए कहा कि वैश्विक ऊर्जा की कीमतों, विशेष रूप से कच्चे तेल की कीमतों को स्थिर रखने के लिए यह ज़रूरी था। फरवरी के आखिर में US और ईरान के बीच संघर्ष शुरू होने के बाद कच्चे तेल की कीमतें बढ़कर $100 प्रति बैरल से भी ऊपर चली गई थीं।

बाद में US ने 30 दिन का एक और लाइसेंस जारी किया, जिससे देशों को ईरानी तेल खरीदने की अनुमति मिल गई। रूसी तेल पर मिली छूट 11 अप्रैल को खत्म हो गई थी, जबकि ईरानी तेल पर मिली छूट 19 अप्रैल को खत्म होने वाली है।

छूट आगे बढ़ाने की मांग

US ट्रेजरी का यह फ़ैसला कई ऐसी रिपोर्टों के बावजूद आया, जिनमें कहा गया था कि भारत सहित एशियाई देशों के अधिकारियों ने वॉशिंगटन से इन प्रतिबंधों में मिली छूट को आगे बढ़ाने का आग्रह किया था।

भारत इस नीति का एक प्रमुख लाभार्थी बनकर उभरा। सरकारी अधिकारियों के हवाले से मिली रिपोर्टों के अनुसार, छूट लागू होने के बाद देश ने लगभग 30 मिलियन बैरल रूसी तेल के ऑर्डर दिए थे।

रिलायंस जैसी भारतीय रिफाइनरियों ने पहले, इन ऊर्जा कंपनियों पर US द्वारा लगाए गए प्रतिबंधों के बाद, रोसनेफ्ट और लुकोइल जैसे रूसी आपूर्तिकर्ताओं से तेल की खरीद कम कर दी थी।

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