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दुनिया के 32 देशो 1 दिसम्बर से चीन को प्रैफरैंशियल टैरिफ लिस्ट से कर रहे बाहर ।

चीन के इस प्रकार महाशक्ति बनने के पीछे उसकी बेहतर अर्थव्यवस्था का हाथ है।परंतु उसके साथ और भी कई वजह रही जिसके कारण पिछले 30 वर्षों में चीन का जो उत्थान हुआ है, उसमें एक बड़ा हाथ चीन के विनिर्माण क्षेत्र का है।

दरअसल वर्ष 1978 में तत्कालीन चीनी नेता तंग श्याओ फंग ने आर्थिक सुधारों के जरिए चीन की दिशा बदली, हालांकि इस दिशा बदलने में विश्व के उन्नत राष्ट्रों का मजबूत हाथ था। यूरोपीय संघ ने चीन के लिए जनरलाइज्ड सिस्टम ऑफ प्रैफरैंस (जी.एस.पी.), यानी वरीयता की सामान्यीकृत प्रणाली लागू की। जी.एस.पी. को यूरोपीय संघ के 27 देशों समेत कुल 32 देशों ने लागू किया।

विश्व के उन्नत राष्ट्रों ने गरीब और पिछड़े देशों को आगे बढऩे का अवसर दिया जिसके तहत इन देशों से उन्नत राष्ट्रों को होने वाले आयात पर शुल्क और टैरिफ बहुत कम लगता था, जो हाल फिलहाल तक जारी था। इसका बड़ा फायदा चीन ने उठाना शुरू किया। उसका कोई भी सामान यूरोप और अमरीका के बाजारों में वहां के स्थानीय स्तर पर बने सामानों से सस्ता होता था, जिस कारण चीन का सामान इन देशों में अधिक बिकता था।

इससे जहां एक ओर चीन को बड़े पैमाने पर आर्थिक मुनाफा होने लगा तो वहीं उन्नत राष्ट्रों के उद्योगों को नुक्सान होने लगा। ऐसे में अमरीका और यूरोप की कई कंपनियों ने अपने उपकरणों को चीन में स्थानांतरित करना शुरू कर दिया जिससे उनके सामान को भी बेचने पर शुल्क में छूट मिले। इससे चीन का विनिर्माण क्षेत्र और तेजी से आगे बढऩे लगा, जिससे उसके करोड़ों लोगों को

वैसे भी पश्चिम के मुकाबले चीन में मजदूरी बहुत कम थी, जिसका भरपूर फायदा चीन ने उठाया।

लेकिन अब चीन की इस आर्थिक गति पर लगाम लगने वाली है क्योंकि इन 32 देशों ने 1 दिसम्बर से चीन को प्रैफरैंशियल टैरिफ लिस्ट से बाहर करने की घोषणा कर दी है। महंगे निर्यात के कारण चीन का सामान इन 32 देशों में वरीयता के आधार पर नहीं बेचा जाएगा, इसकी अगली कड़ी होगी विदेशी उद्योगपतियों का चीन से पलायन, इसके साथ ही देसी उद्योगपति भी चीन छोड़ कर जाने लगेंगे इससे चीन में बड़े पैमाने पर बेरोजगारी फैलेगी। इसका एक बड़ा कारण है चीन की बढ़ती आक्रामकता, उसकी सीमा विस्तार की नीति, गरीब देशों को अपने कर्ज के जाल में फंसाना और खुद अमीर बनते जाना। साथ ही दूसरे देशों को आगे बढऩे का मौका न देना।

वैसे भी यह नीति विकासशील देशों को आगे बढ़ाने के लिए बनाई गई थी और अब चीन न तो विकासशील देश रहा है और न ही गरीब, इसलिए भी उसे वरीयता सूची से हटाया जा रहा है। कोरोना महामारी के बाद वैसे भी बड़े निर्माता चीन से बाहर जाना चाह रहे थे और अब इन देशों की नई नीति चीन में बचे खुचे निर्माताओं को भी किसी दूसरे आशियाने की तलाश में ले जाएगी जिससे चीन का श्रम आधारित उद्योग एक बड़ी मार झेलने वाला है।

चीन के नैशनल ब्यूरो ऑफ़ स्टैटिस्टिक्स (एन.बी.एस.) के आंकड़ों के अनुसार क्रय प्रबंधकों की सूची में अक्तूबर का आंकड़ा 49.2 था, जो सितम्बर के 49.6 से नीचे जा चुका था। क्रय प्रबंधकों की सूची यानी पर्चेजिंग मैनेजर्स इंडैक्स विनिर्माण और सेवा क्षेत्र से जुड़े वर्तमान आर्थिक रुझानों को दिखाता है। चीन के विनिर्माण क्षेत्र का सबइंडैक्स अक्तूबर में फिसल कर 48.4 पर पहुंच गया है जो सितम्बर में 49.5 पर था और यह लगातार तीसरे महीने से गिरावट पर है।

किसी भी देश की क्रय प्रबंधक सूची अगर 50 से ऊपर है तो वह अर्थव्यवस्था के बढऩे की तरफ इशारा करती है जबकि 50 से नीचे के सूचकांक अर्थव्यवस्था में सिकुडऩ को दिखाते हैं। चीन आज जो भी भुगत रहा है उसका कारण वह खुद और उसकी गलत नीतियां हैं।

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